कौन जाने
कौन जाने
बह गया वो
नदी के तेज बहाव सा
कहीं दूर सुदूर
न जाने किस दिशा में।
बस उसने
इतना ही सीखा था
जहां का बहाव बने
उस और बह जाना
सरल तो नहीं था।
किंतु उतना जटिल भी नहीं
जितना वो सोचता था
बचपन से सुनता आया
बुनता आया
सपनों के मायाजाल को।
अपने मर्यादित जीवन में
डरने लगा था
कह जाने से
रह जाने, ढह जाने
सह जाने से
बह जाने से।
फिर भी वो
बहकने से
बचने की ख़ातिर
रमने लगा उसी में
जिसमें उसके
बाकी साथी
बहुत पहले ही
रम चुके थे।
कहता भी तो क्या
ज़रूरत उसकी उतनी थी
जितना भूख को
तृप्त करने के लिए
एक निवाले का कोर।
फिर भी वो
सोचता रहा
कुढ़ता रहा
गूढ़ता रहा
आंखे मूँदता रहा
जितना हो सके
वो अपने ही अंदर
रुन्धता रहा।
लेकिन इतने पर भी
क्या हासिल हुआ
वो रगड़ने लगा
सड़ने लगा
उसका अंतर्मन
पिघलने लगी
उसकी अनर्गल सीमाएं।
जिन्हें वो कभी भी
लांघ नहीं पाया था
एक सुखी लकड़ी
जैसे बिना अपनी
किसी मर्ज़ी बह जाती है
हवा के साथ।
उसी तरह वो भी
बह गया उसी ओर
जिधर का बहाव
उसे अपने अनुकूल लगा।
स्वार्थ की बात कहो
या अर्थ का असल रूप
वो जान गया
मान गया
ईश्वर की करुणा को
उसके उस वीभत्स रूप को।
जिसे सब काग़ज़
के
प्रतिरूप में पहचानते हैं
उसने भी अब
अपना ईष्ट चुन लिया
अब कोई धुनकी नहीं।
जो है सब सच है
कोई मिथ्या नहीं
कोई अपना नहीं
कोई सपना नहीं
कोई मोहपाश नहीं
कोई राम नहीं
कोई अल्लाह ! नहीं।
कोई वाहे गुरु नानक ! नहीं
कोई यीशु मसीह! नहीं
कोई भी फरिश्ता नहीं
सब आडम्बर
और ढकोसले हैं।
जो सच है
वो भूख है
ग़रीबी है
निर्धनता है
अपंगता है
मूढ़ता है
अज्ञान है।
कोई सोच नहीं है
कोई पथ नहीं है
कोई विकास नहीं है
कोई धर्म नहीं है
जिसे वो बचपन से
पूजता आया।
वो इंसानियत
वो मान-सम्मान
वो अखण्ड मर्यादा
सिर्फ किताबी बातें निकली
निरी कोरी किताबी।
अब क्या
उसका यह
नया जन्म
किसका दिया है
उसकी आत्मा का
या उस परमात्मा का।
जिसका रूप उसकी
आंखों से ओझल
हो चुका है
वो नहीं जान पाया
उसकी जीत नहीं
उसकी हार हुई है।
और वो भी निष्क्रिय हार
वो किसी और से नहीं
अपितु स्वयं से
हार गया था
अब कौन उसे
जीत दिला सकता था।
सिवाय उसके
स्वयं के....
वो स्वयं
जो कहीं था ही नहीं
न अंदर न बाहर
न ऊपर न नीचे
न दाएं न बाएं
कहीं बीच अधर में।
वो स्वयं की
खोज में अटक गया था
या यह कहूँ लटक गया था
और कब तक
क्या जाने
कौन जाने।