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Mayank Kumar

Abstract

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Mayank Kumar

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कैसे समेटू यादों को

कैसे समेटू यादों को

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तुम्हारी यादों को कितना समेटू,

कितना रोऊं, तुम रोज ना ऐसे

मन के गांव को निचोड़ा करो,

कि मैं पहले से ज्यादा व्याकुलता

से भर जाऊँ..!





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