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Anju Singh

Abstract


4.6  

Anju Singh

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कागज

कागज

2 mins 380 2 mins 380

कागज का हर एक टुकड़ा

कई रूपों में दिखता है

कुछ नहीं कहता कोरा कागज

पर बहुत कुछ कह जाता है

जब उस पर कुछ लिख छप जाता है


एक मुद्रा का रूप है धरता

भोग विलास का साधन है बनता

लोग इसके पीछे यूं हैं डोलते 

जैसे कि भगवान बन जाता


कभी ये धार्मिक ग्रंथ बन 

पूजा घर की शोभा बढ़ाता

कभी यह अखबार बन कर 

एक दिन की अहमियत पाता


कभी रफ सा पेपर बनकर

कूड़ेदान में है चला जाता

कभी जो बेहतरीन उसपर लिखा जाता

वो संभाल कर रख दिया जाता


कभी दुख भरे लम्हों को

शोक समाचार बनकर पहुंचाता

कभी सुख का संदेशा बन

लोगों को खुशी दे जाता


इन कागजों पर अदालत भी है चलता

दुनिया भर का फैसला इन पर ही टिकता

कभी न्यायालय का फरमान बन जाता

कई विवादों का समाधान बन आता


कभी दुख की पीड़ा है बनता 

कभी बन जाता दिल का मरहम

कभी झगड़े की फसाद है बनता

कभी सुलह का कारण


घर ज़मीं कागज है छीन लेता

कभी ऑंखों की नमी है पोंछता

हर जगह लाजमी यह कागज

जैसे घर का इंसान हो कागज


कभी रिश्तों का गवाह है बनता

तों कभी तलाक का गुनाह बन जाता

जीनें मरने की इजाजत भी देता

रोजमर्रा की जरूरत भी होता


कभी मित्र कभी शत्रु का रूप बनता

कभी जन्म मरण का पत्री बन जाता

जीवन की हर दशा में दिखता

शायद सब की पहचान है होता


बारिशों में नाव भी बन जाता

सर्दियों में उलाव बन तपाता

आसमां में बन पतंग उड़ता

कभी दुनिया का जंग बन जाता


कुछ भी नहीं पर सबकुछ है

क्या अजब सी चीज है

यूं तों खुद में एक माया है

 इसे कोई समझ ना पाया है!


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