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Dinesh Dubey

Abstract

3  

Dinesh Dubey

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कागज की नाव

कागज की नाव

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जब होती थी वर्षा शुरू,

बचपन खिल उठता था , 

कागज की नाव बना,

खूब बहाया करते थे,


अब तो जिंदगी ही हो गई ,

कागज के नव की तरह , 

दुनियां में बह रही है ,

बिन पतवार, बिन खेवैया,


कागज की नाव बहाने में ,

आता था खूब मजा ,

पर जिंदगी की नाव का,

पता नही कब कहां जा डूबेगी ।।



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