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Neeraj pal

Abstract

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Neeraj pal

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काबिल नहीं

काबिल नहीं

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तेरे रहमों करम का है इतना असर,

 जिसे मैं बताने के काबिल नहीं हूँ।


मैं पा तो गया हूँ, मगर जानता हूँ,

कि उसे पाने के काबिल नहीं हूँ।।


जमाने ने मुझको इस कदर है फँसाया,

तेरा नाम हरगिज़ जुबां पर ना लाया।


 खुदगर्ज हूँ मैं,गुनहगार.हूँ मैं,

 तेरे रूबरू होने के काबिल नहीं हूँ।।


 तुमने ही बख्शी है मेरी जिंदगानी,

 मगर तेरी रूहानी दौलत को न जानी।


 जो तुमने दी है जमाने भर की खुशियां,

 उन्हीं को निभाने के काबिल नहीं हूँ।।


 जी चाहता है तुझे अपना बना लूँ ,

 तेरी मोहिनी सूरत को हृदय में समा लूँ।


 तुम्हें दे सकूँ कुछ ए-दिल के मालिक,

 मैं कुछ भी तुमको देने के काबिल नहीं हूँ।।


 दर-दर भटकता हूँ तुझे पाने की खातिर,

 न मिलती है मंजिल, मैं हूँ एक मुसाफिर।


 अब तो ऐ-मेरे मुर्शिद कोई दिखता नहीं है,

" नीरज, अपनी सूरत दिखाने के काबिल नहीं है।।



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