STORYMIRROR

Brajendranath Mishra

Abstract

4  

Brajendranath Mishra

Abstract

जुगनू उगाते हैं

जुगनू उगाते हैं

1 min
493

चलो हाथों में कुछ जुगनू उगाते हैं,

रेखाओं से परे, किस्मत जगाते हैं।


उन्हीं तस्वीरों पर रोया करते है लोग,

जीवन में जो दूसरों के काम आते हैं।


कोई तो सूरत होगी इस भीड़ में कहीं,

जिसकी आंखों से आप आंखें मिलाते हैं।


मैं भटकता हूँ नहीं, तिश्नगी में कहीं,

मिलेगा कोई, जो प्यासे के पास जाते हैं।


कुछ लोग तो होंगे सफर में ऐसे भी,

जो दूसरों का बोझ अपने सर उठाते हैं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract