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Brajendranath Mishra

Abstract

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Brajendranath Mishra

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जुगनू उगाते हैं

जुगनू उगाते हैं

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चलो हाथों में कुछ जुगनू उगाते हैं,

रेखाओं से परे, किस्मत जगाते हैं।


उन्हीं तस्वीरों पर रोया करते है लोग,

जीवन में जो दूसरों के काम आते हैं।


कोई तो सूरत होगी इस भीड़ में कहीं,

जिसकी आंखों से आप आंखें मिलाते हैं।


मैं भटकता हूँ नहीं, तिश्नगी में कहीं,

मिलेगा कोई, जो प्यासे के पास जाते हैं।


कुछ लोग तो होंगे सफर में ऐसे भी,

जो दूसरों का बोझ अपने सर उठाते हैं।


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