STORYMIRROR

GOPAL RAM DANSENA

Abstract

4  

GOPAL RAM DANSENA

Abstract

जमाना जानता है

जमाना जानता है

1 min
157

शाम हो रही है, अंधेरा छा रहा है I

लालिमा अंबर की,पंछी जा रहा है।

कल की सुबह जाने क्या ठानता है।

बदल गये युग पल में जमाना जानता है।


मानव कुनबे की राज और रणनीति।

उथल-पुथल इधर भी ये,है उधर भी।

समंदर की लहरें टकराव ही लानता है।

बदल गये युग पल में जमाना जानता है।


मौन है मानवता मानव पीड़ा देख कर।

तृप्त हैं उनकी अंगेठी मे रोटी सेंक कर।

अवसर ये फायदे का है वो ये मानता है ।

बदल गये युग पल में जमाना जानता है।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract