जमाना बदल रहा हैं
जमाना बदल रहा हैं
जमाना बदल रहा हैं
जमाना बदल रहा है
माला मंच को सेवा समझ रहे हैं।
सेवक जमीन पर बैठें हैं
उनको देख कर हंस रहें हैं।।
अपनी झूठी तारीफ के झंडे
खुद ही गाड़ रहे हैं।
दिखा पैसे की चमक दमक
खुदी ही ताली बाजवा रहे हैं।।
जो महान थे उनको मंच
माला का कभी मोह नहीं रहा।
गरीबों के आंसुओं उनके दुखों का
हमेशा साथ रहा।।
जमाना बदल रहा है
माला मंच को सेवा समझ रहे हैं।
सच में सेवा का भाव समझते हैं तो
उनके दुखों में रम के देखो।
छोड़ के अपने आलीशान महलों को
उनकी जिंदगी के दर्द को देखो।।
जमाना बदल रहा है
माला मंच सेवा को समझ रहे हैं।
जो फांसी पर चढ़े,कुर्बानियां दी,
ने पर गोलियां खाई।
देख ऐसे महानों की कुर्बानियां
पत्थरों की भी आंख भर आई ।।
अब सेवा बाद में करते हैं पहले
अपने नाम के पत्थर लगवाते हैं।
काटने को फीता खुद ही
अपनी कैची साथ लाते हैं।।
जमाना बदल रहा है
माला मंच को सेवा समझ रहें है।।
