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Sanjay Kumar

Abstract

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Sanjay Kumar

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प्यार

प्यार

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हंसता खेलता जीवन अपनी दिशा पर चला जा रहा था।

अचानक उनसे मुलाकात होते दिल बदलता जा रहा था।


जो रातों में सुकून से नींद आती थी बदलती जा रही थी।

 दिन में क्या रात के सपनों में भी मुस्कुराती जा रही थी।


 लोग प्यार कहते हैं वह बात समझ में आती जा रही थी।

एक साथ बैठना सपनों में खो ना ऐसी जाने कितनी यादें बनती जा रही थी।


सात जन्म तक साथ निभाने की ऐसी जाने कितनी कसमें खाई जा रही थी।

अचानक वक्त का पहिया पलटा मेरे नाकाम होने से वह बदलती जा रही थी।


एक दिन डोली में बैठ कर मुस्कुराती हुई किसी और के साथ चली जा रही थी।

क्या कह सकता था दौलत की दुनिया प्यार से भारी होती जा रही थी।


जो लैला मजनू की कहानियां थी वह इतिहास में दफन होती जा रही थी।

मेरे जैसे जाने कितनों के जीवन में ऐसी कहानियां घर करती जा रही थी।


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