सर्दी
सर्दी
दिखलाता हुँ एक गांव की सर्दी
एक माँ चार बजे उठकर
जानवरों को देती हैं चारा।
सर्दी से काँपता बदन उसका
पर मन है उसका न्यारा।।
दिखलाता हूं एक शहर की सर्दी।
एक माँ पांच उठकर ड्यूटी
जाने वालों का भोजन बनाती हैं।
कंपते हैं हाथ उसके फिर भी
अपना दुलारा दिखाती है।।
दिखलाता हूं एक फौजी की सर्दी।
माइनस टेंपरेचर पर भी खड़ा है पहन अपनी वर्दी।।
उसका काँपता शरीर भी कहता है
सच में उसको सर्दी नहीं लगती है।
उसको तो बस देश की चिंता लगती है।
दिखलाता हुँ पुलिसवालों की सर्दी।
गश्त देकर चौराहों पर बिता देते हैं पूरी रात।
सच में बहुत जिम्मेदारी की होती सर्दी की रात।।
दिखलाता हूं एक डॉक्टर की सर्दी।
सोते जग जाता है एक
मरीज की आवाज पर उठ जाता है। ।
भरी सर्दी में भी मरीज की
जान की खातिर दौड़ जाता है।।
दिखलाता हूं चौराहों पर सोते लोगों की सर्दी।
एक कंबल ओढे जगती आंखों में रात काट देते हैं।
कितनों की सर्दी दिखलाऊं तुमको।
जान पर आफत बनती कितनों के दिखलाऊं सर्दी।
फिर भी सब खुश है जीने की आशा लाती है सर्दी।।
सच तो यह हैं उनको सर्दियों को लगती है।
जो आलस में जीवन बिताते हैं काम करते नहीं है।।
