बारिश
बारिश
बैठा मैं घर पर कुछ काम कर रहा था।
कुछ टूटे-फूटे रिश्तों को याद कर रहा था।।
मुस्कुराती बेटी आती है कुछ कागज हाथ में लाती है।
मुस्कुरा कर मुझसे नाव बनाने की कहती है।।
पकड़ के मेरी उंगली को आंगन तक ले आती है।
फिर बारिश की बूंदें मुझको भिगोती है।।
मेरे रोम रोम को रुला देती है।।
फिर से यादों की बारिश शुरू हो जाती है।
मेरे बचपन की यादें मेरे दिल में घर करने लग जाती है।।
झूम झूम के गरजते बादल फिर खूब बरसते बादल।
हम बच्चों की टोली पर बरसते बादल।।
ना चिंताओं का जहाज था बस मस्ती की नाव थी।
छोटे बच्चों के मुस्कुराते बचपन की छाप थी।।
पानी से भरी गलियां मुंह में खट्टी मीठी गोलियां।
सबके घरवालों की वो डांट वाली बोलियां।।
फिर वह अदरक वाली चाय की वो प्यालियाँ।
सच में बहुत याद आती है बरसात वो अठखेलियां।।
आज सब कुछ मिलता है पर बचपन की बरसात नहीं मिलती।
हंसती हुई दोपहर और मस्ती की वो बरसात नहीं मिलती।।
अब मां के हाथ के पकोड़े की वो खुशबू नहीं मिलती।
आज मेरा बचपन मुझे फिर से रुला गया।
मेरी बेटी की वजह से बादल मुझे फिर से भीगा गया।।
