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wasif khan

Abstract

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wasif khan

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ज़िन्दगी

ज़िन्दगी

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माँ तेरी छाया से बाहर निकला

तो ये धूप बहुत चुभने लगी है,


ज़िन्दगी भी कुछ इन

पत्तों की तरह सूखने लगी है,


अब बीमारी की रातों मे कोई

सिरहाने बैठने नहीं आता,


माँ अब बीमार होने में

मज़ा नहीं आता।।


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