STORYMIRROR

wasif khan

Abstract

3  

wasif khan

Abstract

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी

1 min
406

माँ तेरी छाया से बाहर निकला

तो ये धूप बहुत चुभने लगी है,


ज़िन्दगी भी कुछ इन

पत्तों की तरह सूखने लगी है,


अब बीमारी की रातों मे कोई

सिरहाने बैठने नहीं आता,


माँ अब बीमार होने में

मज़ा नहीं आता।।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract