ज़िन्दगी
ज़िन्दगी
मेरा हैरान होना लाज़मी था
मेरी धड़कनें उससे मिलकर
काबू में नहीं थी
एक अजनबी के लिए
इतनी तड़प
इतनी बेताबी
मैंने दिल से पूछा
दिल बोल पडा़
उसने रूह को छुआ है
नाता है उससे पिछले जन्मों का
आंखें भी कहां बस में थीं
बस उसे देखने को बैचेन थीं
आंखों से कब वह अजनबी
दिल में उतर गया
जान न सकी मैं
शायद यही मुहब्बत होती है
कोई अपना लगने लगता है
इतना अपना
कि सांसें भी उसके नाम के
गीत गुनगुनाती हैं
मैंने जान लिया
हां ! मुझे मुहब्बत हुई है
उसकी पीठ पर लिखा मैंने
मुहब्बत और बांध लिया उससे
जन्मों का बंधन
वो कभी अजनबी था
आज मेरी जिंदगी है .........

