ज़िंदगी रुकती नहीं …
ज़िंदगी रुकती नहीं …
ज़िंदगी कहाँ रुकी है
चलती ही चली जाती है
प्यार बाँट के …
ख़ुशी हासिल कर लो क्यूँकि …..
रुकी जब ये ज़िंदगी …
बस रूह ही है जो पछताती है
मोमबती को भी आख़िर में ही पता चलता है …
कि उसे उस धागे ने ही ख़त्म किया
जिसको …
वो सीने में छुपाये मुस्कुराती है
मौक़ा नहीं देती कभी …
मुड़ कर पीछे देखने का …
समझ जब तक आती है …
मिटा सके उस तस्वीर को …
ना मिटने वाले दाग बना जाती है
शायद ये ही ..गुनाह कहलाते हैं
अपने ही किए …
कुछ ग़लत कर्मों के …
जो फल हम भुगतते हैं …
काश एक रबर ऐसा बनाते
तुम प्रभु …..
और मुझे एक पल ऐसा दे देते
मिटा के उस तस्वीर को अपनी
बना पाती वो छवि ….@यशवी
जिस के लिए
भेजा इस धरती में तुमने मुझे …
वादा है मेरा तुझ से ..प्रभु
निराश नहीं करूँगी कभी …
दुनिया में तेरे प्यार की मूरत बन जाऊँगी …
अपना जीवन सफल बनाऊँगी …
ये ज़िंदगी
जिस का नाम है चलना…
सिखलाती है बस यही
जो भी अच्छा कर सको …
कर लेना …
ना रबर कोई बना मिटाने को
ग़लतियों की तस्वीर …
ना रुकी कहीं …
और ना रुकने का…
पैग़ाम सभी को देती जाऊँगी …
