ज़िंदगी के सवाल …
ज़िंदगी के सवाल …
ज़िंदगी एक अनबूझ पहेली
बस चलती चले एक ही राह अकेली …..
पाँच सवालों से बनी थी पर ..समझ ना आया …
सुलझाने वाली गुथी में क्या कमी थी …
इतनी सी बात का जवाब चाहिए था …
ये ज़िंदगी क्यूँ , कहाँ ,कैसे ,कब और किसलिए मिली थी …
बस जिस दिन जान लिया उस दिन से बेगानी सी हो के चली गयी थी …
क्यूँ ….. तो बड़ा ही प्यारा था
कुछ तो अच्छे कर्म थे …
जिस की चाह से मानव जीवन का मिला नजारा था ….
कब … की तो पूछो मत …
अनजाने सफ़र में आँखे खोली तो अद्भुत दुनिया की सतरंगी राहों में खूबसूरत सा प्यारा सा संसार …सारा था …
कैसे … इस की हर चाह में डूब के
फिर ना पीछे देखने का मौक़ा और एक हर तमन्ना पूरी कर लेने की इच्छा का सहारा था ….
कब , कैसे ,क्यूँ …..
सब को भूल गयी …यशवी
सोचने का जो वक़्त मिला ..
उसको भी ना सोच के क्यूँ वक़्त को बर्बाद करती ….
चलती चली गयी …..
यूँ ही मस्ती में …चलती चली गयी
क्यूँ किसी की परवाह करती
आ गया एक मोड़ ऐसा …
जाना कहाँ है …..और किसलिए
तब जा के खुद को संवारा और होश आया ….
जहाँ जाना है …. उसका पता ना था
ढूँढा नही जब उमर भर ….
किसलिए पहुँचना था वहाँ
समझ आया तब …
बस यूँ छोटे से पाँच सवालों के
ए ज़िंदगी तू जवाब ना दे पायी
हर बार बेवफ़ा होती है ….
ये ज़िंदगी ….. अपने ऊपर ये
एक इल्ज़ाम लगाती गयी …
सब की नज़र में यूँ प्यारी सी …ज़िंदगी क़सूरवार बनती गयी
हो सके तो
आख़िर के सवालों के जवाब पहले खोज लेना …
मुस्कुराते हुए जाना यहाँ से ..
अनमोल दौलत है ये …..ज़िंदगी
यशवी का है ये ……………“तोहफ़ा ए ख़िताब “तुझे …
कुछ भी ,कभी भी ,ना हुआ ना होगा …
ज़िंदगी …उस ऊपर वाले का तेरे कर्मो का ….
खूबसूरत हिसाब है तू …
खूबसूरत हिसाब है तू।
