जिंदगी हुई वीरान
जिंदगी हुई वीरान
सड़कें वीरान
शहर सुनसान
जिंदगी के जद्दोजहद में भटकता इंसान
जीवन के लगान को वसूल रहा समय महान
आए न काम कोई भी ज्ञान
क्यों इतना कठोर हुआ है यह समय हे भगवान
पाप पुण्य अब नहीं रहा प्रधान
जिंदगी की सच्चाई है रोटी कपड़ा और मकान
लेकिन इंसान मांगता रहा है विशेष स्थान
बढ़ रही है सांसों की कीमत मजबूर हो रहा है विज्ञान
झांसे में लाने वाले लोग नहीं बचा पा रहे अपनी ही जान
नेताओं के चोचलों में फंस गया है देखो पागल बेइमान
जो करते थे मस्जिद मंदिर का निर्माण
कर रहे थे धर्म का जोरदार गान
बचा पाने में सफल नहीं होंगे वे अपने ही बच्चों के प्राण
लुटने वाला नेता दौरों में बनता रहा महान
जनता सुनती रहती थी उसका ही जय गाथा गान
मेरा शहर भया सुनसान
शहर का सड़क बना मरघट शमशान
जिंदगी हुई वीरान !
