जीवन दर्शन
जीवन दर्शन
कभी होता अपटाउन
कभी होता डाउनटाउन
सपने कई हज़ार लिये
पाने का एक गुब्बार लिये
यूँ ही खो गया मेरा शहर
मैं रात भर चलता रहा
पर हुई कहाँ मेरी सहर
बड़ा रंग था बड़ा नूर था
अपनों से बस मैं दूर था
बस फ़ोन पर ही लेता रहा
देता रहा मैं हर ख़बर
कभी रूबरू ना हो सके
बस दूर बैठे ही पीता रहा मैं ज़हर
मैं रात भर………….
शामें होती बड़ी रंगीन यहाँ
मयखानों में होती भीड़ यहाँ
शबाब और कबाब की
नथुनों में आती महक यहाँ
पर मंदिरों की सीढ़ियों तक ही
जुड़ा रहा अपना सफ़र
मैं रात भर ……………..
लम्बी बड़ी कारें यहाँ
इमारतें बड़ी दीवारें यहाँ
हर शख़्स यहाँ मशगूल है
मसले सभी के न्यारे यहाँ
मशीनी हो गयी ज़िंदगी
चलती सदा यूँ ही आठों पहर
मैं रात भर ……………….
आज़ादी यहाँ भरपूर है
हर शख़्स नशे में चूर हैं
हरे-हरे नोटों की ख़ातिर
हर शख़्स यहाँ मजबूर हैं
अच्छा हुआ ‘निर्वाण’ जो
तू छोड़ आया वो शहर
मैं रात भर……………
कल फिर मिलेंगे?????
