STORYMIRROR

Dr Baman Chandra Dixit

Abstract

4  

Dr Baman Chandra Dixit

Abstract

जिद्दी चट्टान

जिद्दी चट्टान

1 min
153


वहां चाँद है , और सितारे भी

फिर क्या हुआ अगर रात है वो।

कुछ अंधेरों को काले रहने दो,

जहां रोशनियों की ही बात हो।।


जो छिपा कर रखे कई राज़ अपनी,

उन्हें रोशनियों से परहेज़ है क्या?

जाहिर करने से घबराते हो क्यों,

उन्हें भी रोशनी की साथ हो !!


खिड़की की फांक से झांकने की,

तेरी आदत पुरानी गयी नहीँ ।

ताकते चशमे के ऊपर से क्यों

कमजोर नज़र की गर बात हो।।


मत पूछो मेरी पहचान है क्या ,

मैं मुखौटा हूँ ख़ुद ही खुद का।

तुम बदल बदल कर नकाबों को

चेहरा छिपाने का प्रयास हो।।


धूल का परत जम गया होगा,

धुंधला सा आईना दिखता है।

साफ़ करनेसे क्या हासिल होगा

गर मन मे मैल का जमात हो।।


ख़ुद ही कि साये से फक्र क्यों,

अभी वक्त की चाल ढलान पर।

अंतिम लौ की चमक की तरह

रोशनियों की अंतिम सौगात हो।।


अगर उफ़ान पर है नदिया

किनारे का मिटना लाजमी होगा

मगर वो चट्टान भी हो सकता

ना मिटने का जिद्दी आदत हो।।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract