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DR MANORAMA SINGH

Inspirational

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DR MANORAMA SINGH

Inspirational

झुंझलाहट

झुंझलाहट

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बेबसी और क्रोध जब मिल जाते हैं,

तब हम झुंझलाहट में घिर जाते हैं,

हमेशा यूटोपिया में रहना भाता नहीं,

समाज भी भागना आता नहीं ,

मैं समाज से, समिष्ट से जुड़ना चाहती हूं,

मैं व्यष्टि का विराट रूप देखना चाहती हूं ,

मैं भिन्न-भिन्न गुणों से भी परिचित होना चाहती हूं ,

मैं उस रिक्त स्थान को भरना चाहती हूं अपनी लेखनी द्वारा ,

जहां व्यष्टि ,समिष्ट से जुड़ने में सहायक हो सके,

 समस्याओं से आच्छादित समाजों को सधे हुए शब्द बाणों से,

 कंपन उत्पन्न करके, विचलित करना चाहती हूं,

 मैं लेखनी की धार से ,शब्दों के बाण से समाज की बुराइयों को कीलित करना चाहती हूं।।



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