🫖 जादुई चिराग 🫖
😛 एक हास्य काव्य 😛
✍️ श्री हरि
🗓️ 23.10.2025
एक दिन मैं अखबार की रद्दी लेकर कबाड़ी के पास पहुँचा,
गोदाम भरा हुआ था — गली, छत, तहख़ाने तक कबाड़ पहुँचा।
कागज़, किताबें, बोतलें, सबका हिसाब लगाया,
इतने में धूल तले मुझको एक चिराग नज़र आया।
सोचा — “अरे ये तो वही है, किस्मत पलटाने वाला!”
नजर बचाकर लिया मार, जैसे खजाना हो कांरू वाला।
रद्दी के पैसे लेकर मैं तुरंत भागा घर की ओर,
मन में बोला — “आज तो बदलेगी मेरी तक़दीर, श्योर!”
घर पहुँचते ही बीवी बोली — “रद्दी कितने में बेच आए?”
“पहले नहाकर आओ!" हमने ऐसे वचन सुनाए
बीवी बड़बड़ाती बाथरूम गई, मैं कमरे में जा अकड़ा
थैले से झट चिराग निकाला, मिट्टी झाड़कर उसे रगड़ा।
बस फिर क्या था — चिराग से धुआँ उठा, आँखें चमक गईं,
एक जिन्न प्रकट हुआ — मूँछें तनी हुईं, आंखों में ठसक वही।
बोला — “क्या हुक्म है मेरे आका, अपने श्री मुख से फरमाइए,
धन, दौलत, बंगला चाहिए या पड़ोसन को पटवाइए?”
मैंने कहा — “अरे भाई, इतना भी बड़ा काम नहीं है,
मैं तो अपनी बीवी से परेशान हूं, थोड़ा भी आराम नहीं है।
हरदम लडती है, जब देखो तब रानी लक्ष्मीबाई बनी रहती है
फर्क बस इतना है कि वो घोड़े पर और ये मुझ पर सवार रहती है।
ऐसा जादू चला दे कि वो मान ले मेरी बात,
न डाँटे, न ताने मारे , न चलाए घूंसा लात।”
जिन्न ठहाका मार मुस्कुराया, बोला — “आका प्यारे,
इतनी मुश्किल माँग रखी है, इसके आगे तो भगवान भी हारे!
लाखों साल से जिन्न हूँ, चार वेदों छ शास्त्रों का ज्ञान है,
पर बीवी को वश में करूँ — मेरे बस में नहीं ये काम है!”
मैंने कहा — “फिर तू काहे का जिन्न, तेरा क्या फायदा?”
वो बोला — “नाथ! ब्रह्मा जी के भी पास नहीं है इसका कायदा"।
"यदि मैं अपनी बीवी को वश में करना जानता
तो क्यों इस चिराग में बंद पड़ा सालों से धूल छानता!
मैं भी ठाठ से रहता, अपने पैर बीवी से दबवाता
बीवी के ताने खाने के बजाय छप्पन भोग लगाता!”
उस पर तरस आ गया, दोनों बैठ हँसने लगे आँसुओं की धार में,
जिन्न बोला — “बीवी भगवान की अंतिम कला है इस संसार में!”
मैं दिल थामकर बोला — “सच कहा भाई, मान गया तेरी बात,
जिस दिन बीवी बात करे प्रेम से — वही होगा परमानंद का साथ।”
अब चिराग अलमारी में पड़ा पड़ा धूल चाटता रोज़,
में कहता हूँ, “चल!आज से तू भी झेल मेरी बीवी की डोज!”
जिन्न पिघल गया फूट पड़ी उसकी रुलाई, बोला मेरे भाई —
“बीवी वो बला है, जो इंसान तो क्या जिन्नों को भी समझ न आई!”