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Amit Kumar

Romance


4  

Amit Kumar

Romance


इश्क़ जैसा भी हो

इश्क़ जैसा भी हो

2 mins 365 2 mins 365

तुम मशहूर हो रहे हो

अपने ही आप में

लोग पहचानते हैं तुमको

अब इस तरह शहर में

कोई बता दे तुमको

ग़र अपने दिल की बात

समझ लेना एक और गिर गया

अब इश्क़ की राह में

दिल उसी पर आता है

जिसके लिए चूर होता है

अक़्सर नज़दीकियां वहीँ 

गहरी होती है जहाँ

दिल मज़बूर होता है

टूटता वही शज़र है

तूफ़ान के आने पर

जिसको अपने आप पर

बड़ा गुरुर होता है

राह कैसी भी हो

वक़्त कैसा भी हो

लोग कैसे भी हो

इश्क़ जैसा भी हो

आप हर हाल में

आप ही रहोगे

फिर क्यों

कहते हो

सबसे

इश्क़ का अलग

दस्तूर होता है

तुम भी जानते हो

मुझे भी खबर है

ये साथ हमारा तुम्हारा

नज़र भर नज़र है

जो उम्र गुज़र रही है

वो तो एक फ़ानी है

न इश्क़ का दुनियां में

कहीं कोई सानी है

एक लम्हा मुझे दे दो

मुझे वही चाहिए तुमसे

क्यों सोचते हो तुम

उमरभर के मंसूबो के बारे में

जो मुमकिन नहीं था

जब तुमने उसको मुमकिन कर दिया

एक राह भटके मुसाफ़िर को तुमने

इश्क़ की राह पर कर दिया

अब क्यों रोकते हो

उसके क़दमो के निशान को

बढ़ जाने दो उनको

बढे वो जिस दिशा को

ग़र आते है वो तुम तक

तो क़िस्मत तुम्हारी

और जाते है तुमसे तो

कमनसीबी हमारी जो

होना है हो जाने दो

बिखरने दो इश्क़ के नूर को

पहचान लो खुद को

जिसे पहचान लिया है इश्क़ ने

दुनियां का क्या है

वो कब रही किसी के बस में

मेरा गुनाह यही है

एक दिल रखता हुँ

और उसके झरोखे में

एक तस्वीर तुम्हारी भी रखता हुँ

तुम दुआ करो ग़र बचना है

तुम्हे इस इश्क़ से

मेरा दिल ही न रहे

तुम बसी हो जिसमें.....

तब तो मुमकिन तुम्हे भूल पाना

मेरे लिए

जब मैं खुद न रहूँगा अपना

तो क्या करूँगा तुम्हारे लिए

आओ मैं अहद करता हुँ

इस दिल दौलत की कसम

तुम एक बार तो करदो

इस दिल पर ज़रा करम

फिर देखो इश्क़ तुम्हे 

किस तरह आबाद करता है

ये खुदाया कर्म है

जो अपने नूर की बारिश में

हर तरफ दमकता है...

अब तुम भी उसी नूर का

एक ज़र्रा हो रहे हो

ये समझ लो 

इश्क़ की फ़रमाइश हो रहे हो

इश्क़ की फ़रमाइश हो रहे हो....


         


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