STORYMIRROR

Manoj Kakade

Romance

3  

Manoj Kakade

Romance

दोनों ओर प्रेम पलता है

दोनों ओर प्रेम पलता है

1 min
287

दोनों ओर प्रेम पलता है।

सखि, पतंग भी जलता है !

दीपक भी जलता है।

शीश हिलाकर दीपक कहता -

“बंधु, वृथा ही तू क्यों दहता ?'

पर पतंग पड़कर ही रहता ! कितनी विह्नलता है !

दोनों ओर प्रेम पलता है।

बचकर हाय ! पतंग मरे क्या?

प्रणय छोड़कर प्राण धरे क्या ?

जले नहीं तो मरा करे क्या?

क्या यह असफलता दोनों ओर प्रेम पलता है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance