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Shashi Aswal

Abstract

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Shashi Aswal

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इंसानियत खोते जा रहे हैं

इंसानियत खोते जा रहे हैं

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अब ये दुनियाँ हमारे जीने 

लायक नहीं रही मानते हो 

इस बात को 

नहीं न 

नहीं समझोगे 


दिन पर दिन बढ़ते अपराध

मन को कचोटते है 

अब तो कही बाहर जाने से भी 

डर लगने लगता है 


बाहर तो छोड़ो 

अब तो घर में हो 

सुरक्षित नहीं है हम सब 

कब क्या हो जाए 

कौन जानता है भला? 


दूसरों से ज्यादा तो 

अपने ही खतरनाक होते है 

परायों पर भरोसा करो लो 

पर अपनों पर बिल्कुल भी नहीं 


अपने ही अपनों को 

नीचे गिराने का सोचते है 

तोड़ कर रख देते है 

हमारी इच्छाशक्ति को 


पड़ोसी जिन्हें अपने 

घर से ज्यादा 

दूसरों के घर की 

फिक्र रहती है 


अपने घर में भले 

महाभारत चल रहा हो 

पर दूसरे के घर में 

कैसे लड़ाई करवानी है 

अच्छे से जानते है 


अरे पहले अपना

घर तो संभालो 

तब दूसरों का देखना 

कही दूसरों के घर में 

आग लगाते-लगाते 

खुद के घर में न लग जाए 


हर चीज में प्रतिस्पर्धा 

हो गई है अब 

उसके बच्चे कॉन्वेंट 

में पढ़ते है तो 

हम भी उसी में डालेंगे 

उसने आज ये पहना 

मैं भी कल पहनूँगी 


सरकार ने तो महँगाई 

कर दी बहुत 

भले ही घर में दो-चार 

ए.सी. चल रहे हो 


सरकार ने पेट्रोल के 

दाम बढ़ा दिए 

भले ही घर में चार गाड़ियां हो 

चाहे घर किराए पर हो 


मतलब कि सबको मुफ्त 

की खिचड़ी चाहिए पकी पकाई 

बस खाने को मिल जाए 

बनाना न पड़े 

और सरकार या लोगों पर 

दोष मढ़ते रहे 


क्या खुद कभी झाँका है 

अपने मन के अंदर 

क्यों गिर रहे हो इतने ? 

क्यूँ अपने ज़मीर को 

इतना मार चुके हो 

कि अब तुम्हें शर्म 

भी नहीं आती 


इंसानियत अभी भी बची है 

या उसको भी बेच के खा गए 

दूसरों को दिखाने के चक्कर में 

खुद को ही भुला बैठे 

अपने अस्तित्व को 

अपने इंसान होने की बात को 


जिंदगी में बहुत सी चीजें 

ऐसी होती है 

जिन पर विश्वास नहीं 

किया जा सकता 

पर होती है 


मानो या न मानो 

जैसे कि हम अपनी 

इंसानियत खोते जा रहे हैं 

अपना वजूद मिटाते जा रहे हैं 

सब कुछ भूलते जा रहे हैं।


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