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Shubham Sah

Tragedy

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Shubham Sah

Tragedy

इंसान

इंसान

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चेहरा देखा देखा सा है।

इंसान पर अनदेखा सा है।

सब अंदर से मर गए है मुझे,

इस बात का अंदेशा सा है।


अपनों को ही ठगना देखो,

आज कल बना पेशा सा है।

लाश लिए चल रहे है यहाँ सब,

बदबू से जग महका सा है।


अपनों को दर्द देता है वो,

इंसान नशे में बहका सा है।

मिलता है ग़म पीने को यहां,

खुला दर्द का ठेका सा है।


सभी को सभी से बैर यहाँ पर,

झूठों से बना रिश्ता सा है।

सूरज में भी चमक नहीं अब,

एक अंधेरा हमेशा छाया सा है।


कैसे समझाएं जग को रहगुज़र,

वो तो खुद में खोया रहता सा है।


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