ईद मुबारक
ईद मुबारक
बकरीद हो या मीठी ईद,
नित -नित की किट -किट पर भारी ये प्रीत का गीत
शुद्ध हिंदी में ईद का यह जश्न-ए -हर्षोल्लास का संगीत,
न होना भ्रमित की कैसे हुआ यह असंभव मीत,
कश्मकश की उदास सिलवटों से भरे माथे पर
ममता का हाथ फेरती अम्मी हो या माँ,
हर सुबह कमीज की बायीं जेब में आत्मसम्मान के आईने की शक्ल में ईदी रखते,
बन दमकल, सकल सांकल का पेचीदा जंजाल सुलझाते पिता हो या अब्बा,
परवाह से आगाह करती,
अनागत आगंतुक की अनहोनियों से रक्षा का कवच पहनाती
वो मीठी गालियां वालिद की,
रमज़ान पर अज़ान का अमन में डूबा मोहम्मद का फरमान हो, या
दशहरे पर भलाई और शांति के बसेरे में
सुकून भरे पुलकित चेहरों को आठों पहर,
पहरा देते जगत के पनघट पर
लीला रचते-रचाते द्वारपाल का भजन -कीर्तन से गुणगान,
अदीब की मिसाल हो या
तहज़ीब की मूरत,
खीमार की संजीदगी हो या
घूँघट की ओट में छुपी शर्म की नम्र दर्प,
सरगी हो या सेहरी, दोनों ही
आबिद के अक़ीदा की पावन निदा है
दरिंदगी की दहशत पर फ़िदा,
ये हिजाब की नाप का हिसाब रखते बेहूदा
हैं खुदा के घर से विदा,
आयतुल कुर्सी की अज़ीमों शान के अमिट निशान हो या
हनुमान चालीसा का निर्भीक बखान,
हिम्मत बांधते, भूत पिशाच भगाते, जब
सब दिल से करते उस परमवीर परवरदिगार का आह्वान,
हंसी की फुलवारी :
ईद हो या दिवाली,
दोनों की ही फरोख्त खरीद में
सईदों के सईद हुए हैं शहीद,
परिवार जनों की हसरतों के पंछी की
स्वछन्द उड़ान से हो भयभीत
सच न हो जाए ये रघुकुल रीत
खोकर प्रीत का चित्त,
हमारी हार, पिताजी की जीत
हो जाये हमारी धुलाई और मारपीट।
