इबादत-ए-इश्क़
इबादत-ए-इश्क़
"रूह के करीब हो,फिर भी नज़रों से दूर हो तुम,
धड़कन में बसे हो, फिर भी एक ख़्वाब की तरह दूर हो तुम।
सिर्फ़ मोहब्बत ही नहीं, इबादत भी केवल तुमसे है,
मेरी हर दिल्लगी, मेरी हर चाहत भी केवल तुमसे है।
चाह कर भी लफ़्ज़ों में प्यार जता पाते नहीं हम,
सच तो ये है कि अब बिन तेरे रह पाते नहीं हम।
मेरी आँखों में तैरते इस इज़हार को पहचान लो,
बिन कहे ही तुम मेरे दिल के अरमानों को जान लो।
एक बार पास आओ और सीने से लगा लो तुम,
इस तन्हा मुसाफ़िर को मुकम्मल अपना बना लो तुम।"
......आदि 🖋

