दोस्ती जिंदाबाद
दोस्ती जिंदाबाद
गुज़रा हूँ ज़िंदगी के उस कठिन दौर से भी मैं,
जहाँ लोग सिर्फ खामोश नहीं, खत्म हो जाते हैं।
अब न किसी की दस्तक है, न किसी आहट का इंतज़ार,
मैं उस मोड़ से लौटा हूँ जहाँ दिल पत्थर हो जाते हैं।
मेरी चुप्पी को महज़ सन्नाटा समझने की भूल न करना,
मैं वहाँ से गुज़रा हूँ जहाँ इंसान ही खत्म हो जाते हैं।
जो साथ चलते थे, दुनिया को बदलते थे,
कुछ राख हो फिज़ा में मिल गए, तो कुछ ज़मीं में सो गए।
शहर की वो पुरानी गलियां, वो हँसी, वो बेपरवाह बातें,
बीस बरसों की धूल में दब गईं वो मुलाकातें और यादें।
तब मंज़िल का पता न था, बस साथ चलने का जुनून था,
आज सब कुछ पा लिया मैंने, मगर बस उन यारों के साथ ही सुकून था।
मैं फिर भी सब समेटता चला गया,
तन्हा ही सही ज़माने से लड़ता चला गया।
उनके हिस्से की हंसी भी अब मैं अकेले ही हँसता हूँ,
भीड़ बहुत है शहर में, पर मैं उनकी यादों के सन्नाटे में बसता हूँ।
लोग कहते हैं मैं बदल गया हूँ, पत्थर सा हो गया हूँ,
मगर उन्हें क्या पता, मैं अपने यारों की अमानत आज भी सीने में दबाए फिरता हूँ।
................Adi🖋
