बीता हुआ कल
बीता हुआ कल
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"वो जो रूठने पर मना लेते थे, वो साथ छूट गया,
दुनिया की भीड़ में अब अपनों का हाथ छूट गया!
दुनिया की भीड़ में अब अपनों का हाथ छूट गया!
मुश्किलें तो तब भी थीं, पर हम साथ मिलकर लड़ते थे,
आज मुश्किलें वही हैं, बस कंधों का साथ छूट गया!
आज मुश्किलें वही हैं, बस कंधों का साथ छूट गया!
कहाँ जाएँ अब अपनी शिकायतों का पिटारा लेकर,
थक गए हैं खुद को झूठा सहारा देकर।
खामोशियाँ अब शोर करती हैं खाली कमरों में,
वो शख्स गया तो सब कुछ ले गया किनारा देकर।"
खामोशियाँ अब शोर करती हैं खाली कमरों में,
वो शख्स गया तो सब कुछ ले गया किनारा देकर।"
.....आदि 🖋
