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Dr. Akansha Rupa chachra

Romance

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Dr. Akansha Rupa chachra

Romance

शीर्षक-स्वप्न सुंदरी

शीर्षक-स्वप्न सुंदरी

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340

तुम

कौन हो मौन ने पूछा

छलकती

लम्हो की तरह सी

अंगूठी में जडी हुई

नगीना सी


चेहरे पर नूर बिखेरते हुए कुछ इस 

अंदाज मे हँसते है ।आप कि हँसी की

खनखनाहट से

चाँद की चमक भी फीकी सी

अंगड़ाई लेने लगी।


फागुन के मदहोश सी कशिश मे

मदमस्त सी बसंती हवा की छुअन

 मे मेरा मन भी सतरंगी आसमां पर 

उडने लगा।


माथे की बिंदिया चमक रही,तुम

नभ से उतरी परी कोई!

संगमरमर सी अद्भुत साक्षात् 

स्वप्न सुंदरी।


इस लोक की नहीं हो

मेरे दिल की हसरतो को साक्षात् 

करती मेरे मौन को भांप कर

चक्षुश्रवा कर दिल से दिल की

धड़कन की सरगम थिरकती 

मेरी स्वप्न सुंदरी।


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