हरियाली की आस है
हरियाली की आस है
उत्साह हौसलों उमंगों
की पोटली बांधे
निकल पड़ा बंजारा सा मन
कामयाबी की बस्ती में रखने को कदम
साथ लेकर दृढ़ इच्छा कठोर परिश्रम
भेद न पाया लक्ष्य को अपने
नाकामयाबियों ने साथ निभाया हरदम
अब तो निराश हताश परेशान मन की
सुखी बंजर भूमि पर बनी लकीरों
पे सूखी पपडियां दिखने लगी है
हर तरफ अंधेरा है छाया रोशनी भी
कहां किसी की सगी है
थका शरीर जलते पांव
सूखे होठों में प्यास है
कभी तो बरसेंगे
बादल बिखरेगी खुशबू
चारों तरफ हरियाली की आस है।
