हर मंजर मे तुही...
हर मंजर मे तुही...
कहने को कुछ दुरिया है तुमसे
बाकी दिल तो तुमसे ही जूडा हुआ है
नजरो से कभी ओझल नही हो तुम
हर मंजर मे तुही बसा हुआ है..
मेरी पलके भी मुझसे करती है शिकायत
अगर दिदार तेरा ना हो कभी,
कुछ कम रौशन सी लगती है ये दुनिया
तेरा चाँद सा चेहरा जब दिखता नही.
अब तो आसुओ मे भी
हसी छलक जाती है...
क्युकी तेरा हसता हुआ चेहरा इन आखौ मे रेहता है
नजारो से कभी ओझल नही हो तुम
हर मंजर मे तुही बसा हुआ है....
किसी भी राह चलू
मंजिल बस तुम तक है
कोई भी ख्वाईश करु
फर्याद बस तुम तक है,
मेरी हसी, मेरी खुशी, सारे मकाम तुम तक है
तू यार नही खुदा है
मेरी दुनिया के सौ जहनो जैसा है....
नजरो से कभी ओझल नही हो तुम
हर मंजरमे बस तुही बसा है..
कहने को कुछ दूरियाँ है तुमसे
बाकी दिल तो तुमसे ही जूडा हुआ है
नजरों से कभी ओझल नहीं हो तुम
हर मंजर में तू ही बसा हुआ है।

