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VIVEK ROUSHAN

Abstract

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VIVEK ROUSHAN

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होंठों पर मुस्कान थी

होंठों पर मुस्कान थी

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रुख पे जुल्फ कि पर्दादारी उसके होंठों पर मुस्कान थी

तीखा सा था लहज़ा उसका सादगी उसकी पहचान था


चेहरे में एक कशिश थी उसके आँखें भी शैतान थी 

कोमल सी थी काया उसकी वो लड़की बहुत नादान थी 


मेरे जिस्म-ओ-जान में वो कुछ ऐसे सुखन घोल गया

मैं पड़ा था इश्क़ में उसके और वो इससे अंजान थी


दुनिया से रिश्ता एक तरफ था उससे रिश्ता एक तरफ

जिस्म सही सलामत थे पर मेरे दिल कि गली वीरान थी


गली-गली भटकाया खुद को फिर खुद को बर्बाद किया

मैं जिस गली में आन पड़ा था वो गली सुनसान थी

 


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