STORYMIRROR

Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Abstract

4  

Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Abstract

हँसते जख्म

हँसते जख्म

1 min
253

प्यार का कहर बिखेरता ऐसा जहर

रिसते हैं हँसते जख्म ठहर - ठहर


उल्फत ना सही नफरत ही करो

करो जो भी मगर हरवक्त करो


नफरत तो उल्फत का पैगाम होता है

प्रेम में ही नयनों का घमासान होता है


प्यार सरिता में हिचकोले खाता जीवननाव

बचाकर खेना , खोने ना पाए पुराने भाव


आँखों की मदिरा यों ही छलकाती रहो

जमाना रोके गर तो यादों में ही आती रहो


काँटो का क्या फूलों ने दिया है चुभन

गैरों नही अपनो के दर्द से तड़पता मन


गम का शिकवा नही जब मन भौंरा हो

वो डूबता नही जो कभी भी तैरा हो ।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract