हक की बात
हक की बात
अजब गजब है रीत मेरे जहां की
हक को बात झूठी जीत यहाँ की,
गर इस बाबत कुछ किसी ने कहा
तो नहीं गया उन सब से सहा,
कह गए बात अद्भुत, अद्वितीय, निराली
हम गिन गए उसे बकवास बेमतलब वाली।।
काश वह चेहरा अपना आईना में देखते
हक का कोई जिक्र फिर हम कभी न करते,
सब पाना कब, सब खोना बस रोना है
जब दो नाव पर एक ही बार सवार होना है,
हक की आह इक इक रोम रोम की होती
वह यह हम आप सब क्या है
यह रब को भी है हर बार रूलाती।।
न मैं ज्ञानी न विज्ञानी न दार्शनिक न शास्त्री
पर हक की बात कहनी है आती,
संगी संग न पाओगे बेहतर हमसे
संग का रंंग है चढ़ता ज्यादा सबसे,
कहनी है इक खूब कही-सुनी
कि अब सिर पकड़ क्या पछताना
चुग गई चिड़िया जब सारा दाना।।
समय का मोल बहुत है भाई
तभी हक की हर जगह लड़ाई,
समय सत्य को जानो पहचानो
अकड़ दिमाग यूँ न तानो,
संगी सही, राह गर एक अपनाओगे
राही जिस राह के हो
मंजिल उसकी पा जाओगे।।
