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Himanshu Sharma

Abstract

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Himanshu Sharma

Abstract

है!

है!

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कंक्रीट के इस जंगल में,

पाषाण हृदयों का वास है !

गरल से परिपूरित भाव हैं,

और जिव्हा से निकास है !


ये संजय भी तो आजकल,

धृतराष्ट्र से कर रहे हैं छल !

चाह भी राजा, न करे कुछ,

उसे भी छल का आभास है !


हाथ, ये क़लम छोड़ रहे हैं,

ख़ुदको पाप से जोड़ रहे हैं !

पहले कर-कमल हो जाते थे,

आजकल ये सब कयास है !


चोगे भी आज तो मैले हुए हैं,

दाग इस पे यूँ ही फैले हुए हैं !

दागों को बोला जा रहा अच्छा,

विश्वास खो रहा ये संन्यास है !


मुझे आदत थी सत्यवादन की,

ये कटु सत्य के आस्वादन की !

जिजीविषा ने करवा दिया मुझे,

मिथ्यावादन का ये अभ्यास है !


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