हार मान लेना नहीं था स्वीकार
हार मान लेना नहीं था स्वीकार
छोटी सी नन्ही सी थी मुनिया,
घर में चारों तरफ थी उसकी दुनिया।
दिन भर खेलती कूदती ,
चिड़िया की तरह की चहकती फुदकती ।
उस पर थी बौछार,
प्यार के मनुहार की,
नन्हे कदमों से उसने दहलीज पार की।
गई कालेज वो खुशी बेशुमार थी,
सखी सहेलियों का संग ,
थोड़ी छेड़-छाड़ थी।
कालेज में वो अव्वल बनी,
अपने मां बाप का वो संबल बनी।
फूलों की खुशबू सी निखरती जा रही थी,
किसी के दिल में उतरती जा रही थी।
एक दिन उसके सामने प्रेम प्रस्ताव रखा,
सारे जमाने का प्रेम व्यवहार रखा।
मगर उसके साथ थे मां बाप के अरमान,
मना कर दिया उसने उसका प्रस्ताव
सह सका न वो अपना अपमान।
बीत गया कुछ समय बीत गये कुछ दिन,
जा रही थी राह पर अकेले एक दिन।
बस इतना ही सुना था उसने ,
बगल में गाड़ी की आवाज से
दहल उठा था वो पल,
उसके चीखने के अंदाज से।
होश आया तो, खुद को अस्पताल में पाया,
जिंदा थी वो मगर जीवन नहीं था,
आईने में जब उसने खुद को देखा था।
खामोश थे मां बाबू खामोश था परिवार,
उजड़ गया था उसका सारा संसार।
जमाने के डंक मारते प्रश्नों की बौछार,
एक ही उत्तर बार बार ,
कुछ दिन वो छुप-छुपकर रोई,
घुट-घुट कर सोई।
एक दिन फिर थी उसके चेहरे पर मुस्कान,
हार मान लेना नहीं था उसको आसान।।
हार मान लेना नहीं था उसको आसान।।
