गवाह ख़ामोश, दीवारें बोलती हैं”
गवाह ख़ामोश, दीवारें बोलती हैं”
“गवाह ख़ामोश, दीवारें बोलती हैं” और ऊपर बैठा न्यायाधीश की नजरे सच्चाई तोलती है
भारत की न्याय-प्रणाली, सबूतों पर टिकी हुई,
कभी-कभी होता कुछ ऐसा —
गवाह ख़ामोश होते हैं, पर दीवारें बोलती हैं,
और गुनाहों के सारे भेद खोलती हैं।
सी.आई.डी. जैसा सच्चा जासूस हो,
तो सच को सामने ला ही देता है।
हमको तो बचपन से यही सिखाया गया —
कण-कण में भगवान बसते हैं,
जो सब कुछ देखा करते हैं।
सबूतों के अभाव में
जो यहाँ छूट भी जाए,
ईश्वर के दरबार में
उसकी नज़र से बच न पाए।
अपने गुनाहों की उचित सज़ा
वह एक दिन पाता है,
जन्म-मरण के इस फेर में
कब मिलती — कौन बताता है।
मगर गुनाह करने वाले का अंतरमन
सब जानता है न,
उसकी आत्मा भी उसको
भीतर-भीतर कचोटती होगी न।
कहीं वह शांत ऊपर से दिखने वाला मन
मन ही मन ईश्वर से
अपने गुनाहों की माफ़ी माँग रहा होगा,
या फिर किसी ने पकड़ न पाया —
सोच स्वयं को तीसमारखाँ मान रहा होगा।
कहती है विमला —
कण-कण में भगवान हैं,
कोई न कोई तो देख ही रहा है,
उस अदृश्य शक्ति की उपस्थिति को महसूस करो।
और ऐसा कोई कर्म न करो
जो गुनाह की श्रेणी में आए,
जिसका फल जन्मों-जन्मों तक
तुमको भुगतना पड़ जाए।
गवाह ख़ामोश हो सकते हैं,
पर दीवारें बोलती हैं…
और ऊपर बैठा न्यायाधीश
हर सच्चाई तौलती है।
स्वरचित वैचारिक कविता
