अमृत वरदान या अभिशाप
अमृत वरदान या अभिशाप
अमृत : वरदान या अभिशाप
अमृत मंथन से निकला अमृत, अमरत्व का सम्मान,
देवों ने उसमें देखा था, जीवन का वरदान।
पर जब-जब अमरत्व पाकर, बढ़ा अहंकार-स्वभाव,
वरदान भी फिर बन जाता है, जग के लिए अभिशाप।
Shiva से वर पाकर कितने असुर, अत्याचारी बन जाते,
अमर होने के मद में डूबे, सबको दुख पहुँचाते।
फिर उनके ही अंत हेतु, ईश्वर को आना पड़ता,
अलग-अलग अवतारों से अधर्म मिटाना पड़ता।
जन्म-मरण का चक्र प्रकृति का, सबसे सुंदर ज्ञान,
झरते पत्तों से ही सजता, नव कोंपलों का गान।
तन का अमृत बोझ बन सकता, मन का अमृत सम्मान,
सद्कर्मों से अमर हो जाना—यही सच्चा वरदान।
