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Vimla Jain

Abstract Action Classics

4.5  

Vimla Jain

Abstract Action Classics

2100 का ज़माना समय सुहाना होगा,

2100 का ज़माना समय सुहाना होगा,

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2100 का ज़माना
समय सुहाना होगा,
हर ओर सुविधाओं का फसाना होगा।
मशीनें करेंगी हर काम,
और शायद इसी वजह से
लोग कुछ ज़्यादा ही आलसी हो जाएंगे।
हेल्थ और एजुकेशन पर ध्यान होगा,
क्योंकि इनके बिना
कुछ भी संभव न होगा।
मेडिकल क्षेत्र में
अद्भुत तरक्की होगी,
मगर इंसान की निर्भरता
मशीनों पर और बढ़ जाएगी।
बड़े देश
छोटे देशों पर आक्रमण करना चाहेंगे,
उन्हें अपने में मिलाने का सपना देखेंगे,
मगर छोटे देश भी
इतने सक्षम हो चुके होंगे
कि युद्ध का
मुंहतोड़ जवाब दे सकेंगे।
शायद इसी कारण
युद्ध बंद हो जाएँ,
और विश्व शांति का सूरज उगे।
हो सकता है
लोग फिर नए को छोड़
पुराने की ओर लौटने लगें,
और दुनिया की तस्वीर
एक बार फिर बदल जाए।
जैसे हर क्षेत्र में
पहले कुछ नया आता है,
फिर इंसान
पुराने की शरण में लौट जाता है।
नॉन-स्टिक का जमाना आया,
फिर पुराने बर्तनों की याद आई।
कुकर-कढ़ाई छोड़
हांडियों का खाना
फिर से पसंद आने लगा।
नॉर्मल की जगह
बार्बेक्यू भाया,
फास्ट फूड छोड़
हेल्दी फूड की ओर
कदम बढ़ाए गए।
क्योंकि उस समय तक
हम भी शायद
दोबारा जन्म ले चुके होंगे,
और उसी पीढ़ी का हिस्सा बन गए होंगे।
कहीं प्रतिलिपि पर
अपने ही लेख पढ़कर
मुस्कुरा रहे होंगे,
क्योंकि ऑनलाइन लिखा शब्द
तो हमेशा जीवित रहता है—
ऐसा मैं सोचती हूँ। 😆😆
सीमेंट के जंगलों से निकलकर
लोग फिर फार्म हाउस की ओर बढ़ेंगे,
प्रकृति को सहेजने लगेंगे,
और भी बहुत कुछ होगा—
ऐसा मुझे लगता है।
हम जीवित नहीं रहेंगे,
फिर जन्म लेंगे या नहीं—
कहाँ होंगे, कैसे होंगे—
किसे पता।
आपके साथ होंगे या नहीं—
यह भी अनजाना है।
मगर आज
दिल की बात लिख देना अच्छा लगा,
दिल को हल्का कर लेना जरूरी था।
आपने 75 साल बाद का समा पूछा,
और हमने
अपने मन का भविष्य
आपको बता दिया।
अगर लोग
अंधविश्वास से निकलकर
विश्वास की ओर बढ़ें
तो कितना अच्छा हो।
मगर लगता नहीं है मुझे,
क्योंकि नई पीढ़ी
और भी ज़्यादा अंधविश्वासी
होती जा रही है।
शादी के रिश्तों में भी
खुद ही कुंडलियाँ मिलाने लगती है,
माँ-बाप न मिलाएँ
तो वे खुद मिलाने लग जाती हैं।
बात-बात पर
“टच वुड, टच वुड”
की आदत बनी हुई है।
आधुनिकता का मुलम्मा चढ़ाकर
पुरातनपंथ को
आज भी पकड़े हुए हैं।
इसलिए धर्म, अधर्म,
ढकोसला, अंधविश्वास, अनीती
ये सब उस समय भी
रहेंगे ही।
और भी बहुत कुछ होगा
जो हम देख नहीं पाएँगे,
इसलिए उसकी बात
आज क्यों करें।
आज के लिए
इतना ही काफी है—
2100 के ज़माने पर
मैंने जो सोचा,
वह लिख दिया
स्व रचित वैचारिक कविता ✍️



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