Read #1 book on Hinduism and enhance your understanding of ancient Indian history.
Read #1 book on Hinduism and enhance your understanding of ancient Indian history.

Ridima Hotwani

Abstract


4  

Ridima Hotwani

Abstract


गुमनाम सफर

गुमनाम सफर

1 min 385 1 min 385

वो लोग और हैं जो मौत से खौफजदा हैं, कुछ बशर

गुमनामियों के साये में, रोशन मशालों की पैरवी को

बढ़े चले जा रहे, अंधे अनवरत सफर को।


आजीवन जीता रहा सनाम होने को जो

जब कब्र में सोया, उसे गुमनामियों का फर्क ना पड़ा।

आज सोया है वो इस कदर बेखबर,

ठहाके लगा के गूजीं जो हंसी, उसे निशाना बनाकर

गूंज उस निशाने की, खुद ही ख़ामोश हो जाती है उसे छू-छूकर।


क़ातिल ए शिफर था, वो, अपनी ही चंद उमडती जरुरतों का

ज़माना ए शऊर, की ऊंची नसैनी जो पार न कर सका वो

ऐ वक्त, फर्ख ए परिंदे न उड़ा,, माकूल है वो अब भी स्व आत्म को


कि उसकी आत्म जागीर किसी सनामी-अनामी-

गुमनामी की मोहताज नहीं।


Rate this content
Log in

More hindi poem from Ridima Hotwani

Similar hindi poem from Abstract