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Ridima Hotwani

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गोधूलि बेला

गोधूलि बेला

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आई है आई है गोधूलि बेला फिर से छायी है

आसमां ने बाहों की झोली वसुंधरा के सीने पे

क्षितिज आलिंगन सी फैलायी है 

इन आभासी-सुमुखी पलों में आसमां के अश्क

धरा की असीम-वेदना रज-कणों सा धूमिल करेंगे

कसक इन पलों में दोनों एक-दूजे की पूरी हर लेंगे।

आलम होगा कुछ-कुछ ऐसा, पूरे खिले कमल जैसा

अथाह सांसारिक-जीवों का दर्द जब,धरा की गोद में समाता है,

अपनी प्रेयसी वसुंधा के इसी भार का वरण 

हरने ही तो आसमां क्षितिज-आकार में नीचे झुक आता है

प्रेम का उचित प्रतीकांक्ष, नर-नारायण सदृश अद्भुत छटा-ए-नजारा सारे जहां को प्रसाद-रुप वितरित कर जाता है

पावन-पल ये तभी तो जगत-करतार गोधूलि-बेला में सजाता है,

कितना कुछ प्रकृति-चित्रण में खुदा मानव को संदेश भिजवाता है

प्रेम की इस पावन-धुनि को क्यूं मानव नहीं, कुदरत सा समझ पाता है

और हासिल-हासिल-हासिल ही जीवन लक्ष्य रुप हो जाता है।।



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