गजल(जलन)
गजल(जलन)
बस दिखावे का ही सब मिलन हो गया,
मन से मन तो मिलते नहीं, सब का ऐसा मन हो गया।
दिखने में तो इंसान लगते हैं सभी मगर इंसानियत का हनन हो गया।
कर्म धर्म सब छोड़ दिए, ईर्ष्या, द्वेष को पाल एक
दूसरे से जलन हो गया।
घर है, परिवार भी है, माता पिता का संस्कार
भी है, पर वफा का हवन हो गया।
क्या फर्ज है, क्या गर्ज है दिखता नहीं किसी को
गैरों की तरह अपनों का मिलन हो गया।
जन्म से ही सपोले लगते हैं,
डसने से पहले ही जहरीला बदन हो गया।
न जाने किस तरह मिलते
हैं, आपस में सब, बेगानों
की भरमार में अपनों का
निधन हो गया।
हे खुदा अब तू ही मदद कर इंसान की, ताकि इंसानियत जाग सके,
घर मैं बैठे ही एक दूसरे
का हनन हो गया।
माँग दुआ खुदा से सुदर्शन, कि सलामत रहे
भाईचारे की डोर, न जाने
क्यों एक दूसरे से अनबन हो गया।
