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Saroj Garg

Abstract

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Saroj Garg

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गजानन

गजानन

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रूप गजानन देखत सूरत भक्तन के मन हैं हितकारी।

संग सुवासित रिद्धिन-सिद्धिन देत  अशीष सबे अति भारी ।।


हे गणराज बसों अब आँगन, मेटत कष्ट सदा सुखहारी ।

धूप चढ़े उन पे तब लाकर दूब लगे उनको अति प्यारी।


हे गणराज सुनो विनती अब दूर करो तुम कष्ट हरो जी ।

नाव फँसी मझधार जरा तुम आकर सागर पार करो जी।।



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