गीत
गीत
लाली बिंदी उसको साजे ,सुहाग रूप अपार।
कुमकुम काजल बिंदी चूड़ी,नारी का श्रृंगार ।।
सपन सलोने लेकर आती,प्रीतम के घर द्वार।
करती हैं न्योछावर सब कुछ,अपना सब कुछ हार। ।
सास-ससुर को अपना जाना,सेवा कर हर बार।
कुमकुम काजल बिंदी चूड़ी,नारी का श्रृंगार। ।
हाथों कंगन साजे जब भी,महक उठे संसार ।
ओढ़ चुनरिया लाज रखती,प्रीतम उसका प्यार।।
दोनों कुल की लाज बचाती,करती प्यार अपार।
कुमकुम काजल बिंदी चूड़ी,नारी का श्रृंगार। ।
समय पड़े पर दुर्गा बनती,रखती रूप अपार।
दुष्टों को है मजा चखाती,कर देती संहार। ।
इसीलिए नारी को समझो,दुर्गा का अवतार।
कुमकुम काजल बिंदी चूड़ी,नारी का श्रृंगार। ।
