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Prafulla Kumar Tripathi

Abstract

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Prafulla Kumar Tripathi

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ग़दर के निशाँ !

ग़दर के निशाँ !

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अभी भी हैं करते

वे किस्सा बयाँ

अभी भी हैं ज़िंदा

ग़दर के निशाँ


लगे ऐसे जैसे हो

कल की ही बातें

अवध के मुकम्मल

सियासत की बातें


नजाकतअमन-चैन

नफासत की बात

कहीं तो था दुश्मन

लगाये था घात


नहीं दिखता फिर भी

कहर दिन और रात

निपट लेंगे इससे

ना चिंता की बात।


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