गौरैया
गौरैया
गौरैया तुम कहां चली गई हो
तुम्हारी चीं चीं अब सुनाई नहीं देती है
मेरा घर आंगन सूना है
आकर उस आंगन में
चीं चीं कर गाओ
घर में, रोशनदान में
तुम्हारा घर नहीं दिखता
घर में बेखौफ घूमना
दाना चुगना नहीं दिखता
अब वो आवाज कहां
जो दिल को खुश कर देती थी
तुम कब आओगी
आओ गौरैया आओ मेरा आंगन
फिर से गुलज़ार कर जाओ
तुम्हारी चीं चीं सुनने को तरसते हैं
तुम्हारी चीं चीं की याद में आंखें नम है
तुम किससे डर गई हो
किसने तुम्हें हमसे दूर कर दिया है
क्या शोर शराबे ने डरा दिया है
या फिर जाल ने फंसा लिया है
क्या शहर की भीड़ में खो गई हो
या पेड़ों की कमी से डर गई हो
ऊंची इमारतों, बिजली के तारों
प्रदूषण,कीट पतंगों के कम होने पर
कहीं प्रकृति की पुकार पर
अपने बच्चों के लिए चली गई हो
तुम्हारी चीं चीं अब भी
मेरे कानों में गूंजती है
शायद इंसान की अंधी दौड़ ने
तुम्हारे पंखों को बांध दिया है
तुम्हारी याद में आंगन सूना है
तुम्हें बुला रही पेड़ की डालियां
आओ गौरैया आओ
तुम्हारी चीं चीं सुनने को तरसते हैं
नन्ही गौरैया लौट आओ
आओ मेरे आंगन में
जैसे पहले आया करती थी
फिर से गुलज़ार कर जाओ
