बेटी
बेटी
बेटी बचाओ बेटी पढाओ
सुनकर बेटी का भविष्य बनाने लगा
अच्छे स्कूलों का चयन कर भेजने लगा
बड़े मनोयोग से उसका साथ देने का
निश्चय किया
गुड टच बैड टच समझाया
विपत्ति आने पर चिल्लाना सिखाया
अदृश्य साए की तरह उसका साथ दिया
पर उस अंधेरी रात ने सब छीन लिया
बैड टच जान कर चिल्लाना चाहा
दरिंदों ने मुंह भींचकर
वहशीपन की सारी हदें पार कर दी
अनगिनत निशान जिस्म पर छोड़ दिए
जिन्हें देख कर मेरी आत्मा जार जार रोई
हृदय चीत्कार उठा
बेटी को बचाने के लिए पढाया
पर वह बच न सकी
अब मैं क्या कामना करुं
अगले जन्म मोहे बिटिया ना दीजौ या
इसी बेटी की चाहना करुंँ
दरिंदों से बदला लेने के लिए
पुनः मेरे घर में जन्में।
