एक कवि हूँ मैं
एक कवि हूँ मैं
हाँ , एक कवि हूँ मैं,
कहते , समय का छबि हूँ मैं
लिखता हूँ ख़ुद पड़ता हूँ ख़ुद
सुनता भी हूँ मैं ख़ुद ही को ख़ुद
क्यों के एक कवि हूँ मैं।।
सभा समितियों में जाता हूँ मैं
मग्न तल्लीन उन्हें सुनता हूँ मैं
बेवजह ताली बजाने की होड़
झट शामिल हो जाता हूँ मैं।
क्यों के एक कवि हूँ मैं।।
भाषण खत्म भाषक गायब
बहुत ब्यस्त हैं आजकल साहेब
और भी कई निकलेंगे ऐसे
जान के अनजान अब भी हूँ मैं
क्यों के एक कवि हूँ मैं।।
कविता दस कवि भी दस
वक्त खत्म हो चुका है बस
कुछ भी पढ़ो निकलो जल्दी
चेहरा सब की पढ़ता हूँ मैं
क्यों के एक कवि हूँ मैं।।
जो निकल गये उनकी निकल पड़ी
पड़े हैं जितने , उनको क्या पड़ी
फिर भी एक उम्मीद ले कर
कुर्शियों को गीत सुनाता हूँ मैं
क्यों के एक कवि हूँ मैं।।
