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VIVEK ROUSHAN

Abstract

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VIVEK ROUSHAN

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एक करार हुआ है दोस्त

एक करार हुआ है दोस्त

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हम में तुम में एक करार हुआ है दोस्त 

जियेंगे , जैसे हमें प्यार हुआ है दोस्त 


पास है तन्हाई , है रात की ख़ामोशी भी 

कब किसी का दिल पे इख्तियार हुआ है दोस्त 


नफरत हीं नफरत है फ़िज़ा में फैली हुई 

प्यार में जीना यहाँ अब दुश्वार हुआ है दोस्त 


रात का अँधेरा तो यूँ हीं बदनाम है 

दिन के उजाले में मुझ पे वार हुआ है दोस्त 


कुछ बातें कहनी होंगी ज़माने भर से 

यूँ हीं नहीं कोई सुखन-कार हुआ है दोस्त 



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