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Jalpa lalani 'Zoya'

Abstract

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Jalpa lalani 'Zoya'

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एक ख़त उनके नाम

एक ख़त उनके नाम

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दिल के कागज़ पे एक ख़त उनके नाम लिख रही हूँ

बेशक़ बग़ैर पते का है वो मुक़ाम, जहाँ भेज रही हूँ


मन में उठते हर सवाल का उससे जवाब मांग रही हूँ

धोखे से मिले ज़ख्मों का, उससे मरहम मंगा रही हूँ


न समझे लफ़्ज़ों की बोली, सिर्फ एहसास जता रही हूँ

सारे रिश्ते नाते तोड़ के उससे गहरा रिश्ता बना रही हूँ


पहुँच जाए ख़त दर-ए-मक़सूद पे, यही राह देख रही हूँ

समा जाऊँ नूर-ए-खुदा में, ख़ुद को काबिल बना रही हूँ।


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